साल 2016 की वो शाम,
गमी से बुरा हाल…..कूलर की हवा में बेठा हर रोज़ की तरह में टीवी देख रहा था, टीवी तो क्या डब्बा था डब्बा। LED तो हमने रमेश की शादी में समधी सा को Gift में दे दिया था…..बस, तब से हम इसी से काम चला रहे थे। हालाकी, जब हमें ये हमारे ससुराल से Gift में मिला था तब ये किसी LED से कम नहीं था।
तभी मोबाइल की घंटी बजी……( फ़ोन रमेश के ससुराल से था )
हम गीता को नहीं भेजेंगे…..(सामने से आवाज आई)
कोई बात नहीं, बच्चों की भी अभी छुट्टी चल रही हे। कुछ दिन और रहने दो…(मेने कहा)
हम उसे अब कभी नहीं भेजेंगे…….(समधी जी ने कहा)
क्या हो गया,अभी तो ख़ुशी ख़ुशी गई थी बहु यहाँ से…..(मेने बात को सम्हालते हुए कहा)
वो तो खुश हे, लेकिन हम खुश नही हे। आप तो हमारी बेटी को ले गए अब हमारा ध्यान कौन रखेगा…….(समधन जी ने पीछे से कहा)
में कुछ समझा नहीं…..(मेने कहा)
समझाना समझना कुछ नहीं हे, गर्मी बहुत हे हमें AC चाहिए…..वर्ना अपनी बहु को भूल जाओ। (और फ़ोन कट गया )
<मेरे पेरो तले ज़मीन खिसक गई थी ,मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था की मैं क्या करू ……. हालाकी मुझे इतना जरुर पता था की जिस चीज की वे लोग माांग कर रहे थे वो दहेज था!>
मेने रमेश को अाावाज लगाई……
बहु के साथ कुछ झगडा हुआ था क्या..(मेने पुछा)
नही तो,वो तो बहुत खुशी से जा रही थी..बहुत दिनों बाद अपने मम्मी पापा से जो मिलने वाली थी….पर हुआ क्या…
वे अब बहु को नहीं भेजेंगे, फोन पर अभी उन्होंने A.C. की मांग की है..
लेकिन पापा…..ऐसा कैसे हो सकता है, गीता को तो पता है की शादी का कर्जा ही अभी उतरा नही है तो फिर यह ए.सी. …..(रमेश ने गीता को कसुरवार ठहराया)
<बातचीत अब कोतुहल का विषय बनती जा रही थी> <रमेश की माँ, जो काफी देर से रसोई से हमारी बातो को आटे की पिटाई करते हुए सुन रही थी…अब बातचीत का हिस्सा थी>
यह भी तो हो सकता है, की बहु को इस बारे में कुछ पता ही ना हो…(रमेश की माँ ने कहा )
<कीसी सााँस का अपनी बहु पर इस तरह का विश्वास मेने पहली बार देखा था>
क्या हुआ दादु…(रमेश की छोटी बेटी ने कहा)
<शायद,समाज के इस पहलु ने उसे भी अपनी किताबी दुनिया से बाहर आने पर मजबूर कर दिया>
तुम अभी छोटी हो, तुम नही समझोगी…(रमेश ने उसे टोकते हुए कहा)
क्यों नहीं समझूंगी, मुझे पता है आप लोग दहेज (Dahej Pratha) की बात कर रहे है..(छोटी के इस शब्द “दहेज” ने सभी को स्तब्ध कर के रख दिया…)
मेने अपनी हिंदी की किताब मे पढा था दहेज के बारे मे …“शादी के समय वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष से किए गए उपहार की मांग को ही दहेज कहते हें ” (दहेज की परिभाषा देकर छोटी ने अपने बडे हो जाने का प्रमाण तो दिया, लेकिन इस शब्द की गहराई से वो बबल्कुल अंजान थी…)
लेकीन दादु, ये प्रथा (Dahej Pratha) तो कब से बंद हो गई…और वैसे भी दहेज तो लडके वाले मांगते हें ना, तो फिर नानाजी हमसे क्यों मांग रहें हैं…(छोटी ने कहा)
<छोटी के इन सवालौ ने मुझे वापस अपनी उस दुनिया में ले जाकर खडा कर दिया, जहाँ में कभी इन मुद्दों पर अपनी राय रखता था>
बोलौ ना दादु…(छोटी ने फिर कहा)
<मेने छोटी के सर पर प्यार भरा हाथ रखा>
दहेज़ प्रथा (Dahej Pratha)
“बात तब की है बेटा, जब भारत सोने की चिड़िया था…लोग इतने धनवान थे की शादीयों में दिल खोल कर खर्चा करते थे और बडे-बडे उपहार देते थे…समय के साथ भारत सोने की चिड़िया तो नही रहा पर उपहार देना एक प्रथा बन गई और धीरे-धीरे यह प्रथा सिर्फ लडकी वालों के लिए रह गई..लोग अब शादी के लिए बडे बडे उपहारों की मांग करने लगे..और जन्म हुआ दहेज प्रथा का।
समय के साथ दहेज (Dahej Pratha) ने अपना भयानक रूप दिखाया और जो लोग दहेज देने मे सक्षम नही थे, वे लडकियों को बोझ समझने लगे..दहेज के लालच मे लोगो ने अपनी बहुओ को पप्रताड़ित करना शुर कर दिया, दहेज का भयानक रूप तो तब सामने आया जब दहेज के डर से लोगों ने बेटियों को माँ की कोख मे ही मारना शुर कर दिया…धीरे-धीरे लडकियों की संख्या लडकों के मुकाबले कम होने लगी, लडकियों ने भी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जी-तौड मेहनत करना शुरू किया …
अब लड़कियां हर क्षेत्र मे लडकों से कंधे से कन्धा मिलाकर चलने लगी…लेकिन लडकियों की संख्या मे हुई वो कमी आज भी है और इसीलिए शादी के लिए आज लडकी वालों की तरफ से पेसो और उपहारों की मांग की जाने लगी….और तब दहेज का एक दुसरा रुप सामने आया…एक प्रथा ही दुसरी प्रथा को जन्म देती है, फंडा यह है की किसी प्रथा को खत्म करने की बजाय उसके सही और गलत पहलु की और ध्यान दिया जाए…”
तभी दरवाजे की घंटी बजी….
छोटी ने दौड कर दरवाजा खोला… हाथों मे बैग और आँखों मे आंसू लिए गीता दरवाजे पर खडी थी…
आज से यही मेरा घर है, मे वो घर छोड आई हूँ पापा….
जो मेरा सौदा करे वो मेरे माँ बाप नहीं हो सकते…(गीता ने रमेश की तरफ देखते हुए कहा)
रमेश की आँखे भर आईं, उसने दौडकर गीता को गले से लगा लिया…
<आज फिर एक बेटी ने परिवार को बिखरने से बचा लिया था>
«नारी के अटूट प्रेम का बेजोड़ उदाहरण आज मेरे सामने था»
दहेज़ (Dahej)
दहेज़ (Dahej)
मेने अपने हाथ पर प्यार भरा एक हाथ महसूस किया, दौ प्यार भरी आँखे गली के नुक्कड तक घुम आने का निमंत्रण दे रही थी…रमेश की माँ और मे बुढापे के उस सफर मे मुहोब्बत का हाथ थामे आज थोडा दूर निकल आए थे…..
ताकि शाम के खाने मे प्यार का थोडा तडका और लग जाए……
$$ J.P. BABBU

एक कहानी मिली है ,इस कहानी को पढ़ कर सोचिये और समझिये।।।
ध्यान से पढ़ें,
किसी गाँव में चार मित्र रहते थे।
चारों में इतनी घनी मित्रता थी कि हर समय साथ रहते उठते बैठते, योजनाएँ बनाते।
एक ब्राह्मण
एक ठाकुर
एक बनिया और
एक नाई था
पर कभी भी चारों में जाति का भाव नहीं था गज़ब की एकता थी।

इसी एकता के चलते वे गाँव के किसानों के खेत से गन्ने
चने
आलू आदि चीजे़ उखाड़ कर खाते थे।
एक दिन इन चारों ने किसी किसान के खेत से चने के झाड़ उखाड़े और खेत में ही बैठकर हरी हरी फलियों का स्वाद लेने लगे।
खेत का मालिक किसान आया
चारों की दावत देखी उसे बहुत क्रोध आया
उसका मन किया कि लट्ठ उठाकर चारों को पीटे
पर चार के आगे एक?
वो स्वयं पिट जाता
सो उसने एक युक्ति सोची।
चारों के पास गया,
ब्राह्मण के पाँव छुए,
ठाकुर साहब की जयकार की
बनिया महाजन से राम जुहार और फिर
नाई से बोला-
देख भाई
ब्राह्मण देवता धरती के देव हैं,
ठाकुर साहब तो सबके मालिक हैं अन्नदाता हैं,
महाजन सबको उधारी दिया करते हैं
ये तीनों तो श्रेष्ठ हैं
तो भाई इन तीनों ने चने उखाड़े सो उखाड़े पर तू? तू तो ठहरा नाई तूने चने क्यों उखाड़े?
इतना कहकर उसने नाई के दो तीन लट्ठ रसीद किये।
बाकी तीनों ने कोई विरोध नहीं किया क्योंकि उनकी तो प्रशंसा हो चुकी थी।
अब किसान बनिए के पास आया और बोला
तू साहूकार होगा तो अपने घर का
पण्डित जी और ठाकुर साहब तो नहीं है ना! तूने चने क्यों उखाड़े?
बनिये के भी दो तीन तगड़े तगड़े लट्ठ जमाए।
पण्डित और ठाकुर ने कुछ नहीं कहा।
अब किसान ने ठाकुर से कहा-
ठाकुर साहब
माना आप अन्नदाता हो पर किसी का अन्न छीनना तो ग़लत बात है
अरे पण्डित महाराज की बात दीगर है
उनके हिस्से जो भी चला जाये दान पुन्य हो जाता है
पर आपने तो बटमारी की! ठाकुर साहब को भी लट्ठ का प्रसाद दिया,
पण्डित जी बोले नहीं,
नाई और बनिया अभी तक अपनी चोट सहला रहे थे।
जब ये तीनों पिट चुके
तब किसान पण्डितजी के पास गया और बोला-
माना आप भूदेव हैं
पर इन तीनों के गुरु घण्टाल आप ही हैं
आपको छोड़ दूँ
ये तो अन्याय होगा
तो दो लट्ठ आपके भी पड़ने चाहिए।
मार खा चुके बाकी तीनों बोले
हाँ हाँ, पण्डित जी को भी दण्ड मिलना चाहिए।
अब क्या पण्डित जी भी पीटे गए।
किसान ने इस तरह चारों को अलग अलग करके पीटा
किसी ने किसी के पक्ष में कुछ नहीं कहा,
उसके बाद से चारों कभी भी एक साथ नहीं देखे गये।
मित्रों पिछली दो तीन सदियों से हिंदुओं के साथ यही होता आया है,
कहानी सच्ची लगी हो तो समझने का प्रयास करो और
अगर कहानी केवल कहानी लगी हो
तो आने वाले समय के लट्ठ तैयार हैं।
$$ J.P. BABBU

जैसे ही ट्रेन रवाना होने को हुई, एक औरत और उसका पति एक ट्रंक लिए डिब्बे में घुस पडे़।दरवाजे के पास ही औरत तो बैठ गई पर आदमी चिंतातुर खड़ा था।जानता था कि उसके पास जनरल टिकट है और ये रिज़र्वेशन डिब्बा है।टीसी को टिकट दिखाते उसने हाथ जोड़ दिए।
" ये जनरल टिकट है।अगले स्टेशन पर जनरल डिब्बे में चले जाना।वरना आठ सौ की रसीद बनेगी।" कह टीसी आगे चला गया।
पति-पत्नी दोनों बेटी को पहला बेटा होने पर उसे देखने जा रहे थे।सेठ ने बड़ी मुश्किल से दो दिन की छुट्टी और सात सौ रुपये एडवांस दिए थे। बीबी व लोहे की पेटी के साथ जनरल बोगी में बहुत कोशिश की पर घुस नहीं पाए थे। लाचार हो स्लिपर क्लास में आ गए थे। " साब, बीबी और सामान के साथ जनरल डिब्बे में चढ़ नहीं सकते।हम यहीं कोने में खड़े रहेंगे।बड़ी मेहरबानी होगी।" टीसी की ओर सौ का नोट बढ़ाते हुए कहा।
" सौ में कुछ नहीं होता।आठ सौ निकालो वरना उतर जाओ।"
" आठ सौ तो गुड्डो की डिलिवरी में भी नहीं लगे साब।नाती को देखने जा रहे हैं।गरीब लोग हैं, जाने दो न साब।" अबकि बार पत्नी ने कहा।
" तो फिर ऐसा करो, चार सौ निकालो।एक की रसीद बना देता हूँ, दोनों बैठे रहो।"
" ये लो साब, रसीद रहने दो।दो सौ रुपये बढ़ाते हुए आदमी बोला।
" नहीं-नहीं रसीद दो बनानी ही पड़ेगी।देश में बुलेट ट्रेन जो आ रही है।एक लाख करोड़ का खर्च है।कहाँ से आयेगा इतना पैसा ? रसीद बना-बनाकर ही तो जमा करना है।ऊपर से आर्डर है।रसीद तो बनेगी ही।
चलो, जल्दी चार सौ निकालो।वरना स्टेशन आ रहा है, उतरकर जनरल बोगी में चले जाओ।" इस बार कुछ डांटते हुए टीसी बोला।
आदमी ने चार सौ रुपए ऐसे दिए मानो अपना कलेजा निकालकर दे रहा हो। पास ही खड़े दो यात्री बतिया रहे थे।" ये बुलेट ट्रेन क्या बला है ? "
" बला नहीं जादू है जादू।बिना पासपोर्ट के जापान की सैर। जमीन पर चलने वाला हवाई जहाज है, और इसका किराया भी हबाई सफ़र के बराबर होगा, बिना रिजर्वेशन उसे देख भी लो तो चालान हो जाएगा। एक लाख करोड़ का प्रोजेक्ट है। राजा हरिश्चंद्र को भी ठेका मिले तो बिना एक पैसा खाये खाते में करोड़ों जमा हो जाए।
सुना है, "अच्छे दिन " इसी ट्रेन में बैठकर आनेवाले हैं। "
उनकी इन बातों पर आसपास के लोग मजा ले रहे थे। मगर वे दोनों पति-पत्नी उदास रुआंसे
ऐसे बैठे थे मानो नाती के पैदा होने पर नहीं उसके सोग में जा रहे हो। कैसे एडजस्ट करेंगे ये चार सौ रुपए? क्या वापसी की टिकट के लिए समधी से पैसे मांगना होगा? नहीं-नहीं। आखिर में पति बोला- " सौ- डेढ़ सौ तो मैं ज्यादा लाया ही था। गुड्डो के घर पैदल ही चलेंगे। शाम को खाना नहीं खायेंगे। दो सौ तो एडजस्ट हो गए। और हाँ, आते वक्त पैसिंजर से आयेंगे। सौ रूपए बचेंगे। एक दिन जरूर ज्यादा लगेगा। सेठ भी चिल्लायेगा। मगर मुन्ने के लिए सब सह लूंगा।मगर फिर भी ये तो तीन सौ ही हुए।"
" ऐसा करते हैं, नाना-नानी की तरफ से जो हम सौ-सौ देनेवाले थे न, अब दोनों मिलकर सौ देंगे। हम अलग थोड़े ही हैं। हो गए न चार सौ एडजस्ट।" पत्नी के कहा। " मगर मुन्ने के कम करना....""
और पति की आँख छलक पड़ी।
" मन क्यूँ भारी करते हो जी। गुड्डो जब मुन्ना को लेकर घर आयेंगी; तब दो सौ ज्यादा दे देंगे। "कहते हुए उसकी आँख भी छलक उठी।
फिर आँख पोंछते हुए बोली-" अगर मुझे कहीं मोदीजी मिले तो कहूंगी-" इतने पैसों की बुलेट ट्रेन चलाने के बजाय, इतने पैसों से हर ट्रेन में चार-चार जनरल बोगी लगा दो, जिससे न तो हम जैसों को टिकट होते हुए भी जलील होना पड़े और ना ही हमारे मुन्ने के सौ रुपये कम हो।" उसकी आँख फिर छलके पड़ी।
" अरी पगली, हम गरीब आदमी हैं, हमें
मोदीजी को वोट देने का तो अधिकार है, पर सलाह देने का नहीं। रो मत
विनम्र प्राथना है जो भी इस कहानी को पढ चूका है उसने इस घटना से शायद ही इत्तिफ़ाक़ हो पर अगर ये कहानी शेयर करे कॉपी पेस्ट करे पर रुकने न दे शायद रेल मंत्रालय जनरल बोगी की भी परिस्थितियों को समझ सके। उसमे सफर करने वाला एक गरीब तबका है जिसका शोषण चिर कालीन से होता आया है।

🌹🙏परिवर्तन 🙏🌹

मैं जब शादी होकर ससुराल आई , तो मैंने देखा वहां पर मेरी बड़ी ननद का राज चलता है । और हर कोई उन्हीं की बात मानता था , कोई उनके सामने किसी बात पर बहस नहीं करता था । मैंने अपने पति से बात करने की कोशिश की थी , उन्होंने यही कहा कि "वह जो बोले वह काम कर दो बाकी तुम्हें कुछ बोलने की जरूरत नहीं है अगर वह गलत भी बोलेगी तो हां कह देना" मुझे यह समझ में नहीं आता कि ऐसा क्या है कि हर कोई उनसे डरता है कोई भी उनको कोई बोल नही सकता वह रूठ जाती थी, यहां तक की मेरे सास ससुर भी उनकी बातें मानते थे । वह जॉब करती थी। मुझे वह पत्थर दिल लगती थी । वे मुुुझसे ज्यादा बात भी नहीं करती थी । उनका एक रूटिन बना था उसमें कोई भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता था वह 6:00 बजे उठ कर घूमने जााती थी 8:00 बजे उन्हें नाश्ता चाहिए था पेपर के साथ चाय नाश्ता करनेे के बाद 10:00 बजे ऑफिस जाती थी ।ऑफिस से 4:00 बजे वापस आती थी । और आकर आराम कुर्सी पर आराम करती थी शाम को टहलने निकलती थी उसके बाद 9:00 बजे सो जाती थी उनका पूरा रूटीन था और सब काम टाइम टेेेेबल से ही करती थी ।मगर वह वह घर का कोई काम नही करती थी । वह मिजाज बड़ी सख्त थी मैंने बहुत कोशिश करी ऐसा क्या कारण है दीदी का ऐसा रूखा व्यवहार है और सभी लोग उनकी बात मानते हैं , मगर मुझेे समझ में नही आता था ।

मुझे उनसे नफरत होने लगी थी ।

एक दिन घर पर कोई नहीं था और मेरी मौसी सास आई । जब मैंने उनसे इस बारे में पूछा उन्होंने बताया राधिका (यह हमारी दीदी का नाम था) पहले ऐसी नहीं थी वह बहुत ही मिलनसार लड़की थी और सब से मिलजुल कर रहती थी सबका काम करती थी । फिर उसकी शादी की उम्र हुई तो अच्छा लड़का और परिवार देखकर उसकी शादी भी कर दी। दीदी का परिवार बहुत अच्छा था। वो लोग दीदी को भी बहुत मानते थे । मगर 2 साल तक होने बच्चे नहीं हुए दोनों ने डॉक्टर से जांच करवाई तब पता चला कि दीदी के गर्भाशय में बीमारी है जिस वजह से उन्हें बच्चे नहीं हो सकते । यह बात जाानकर उनके पति और ससुराल वालों ने,.... जो वह ससुराल वाले जो दीदी को बहुत प्यार करते थे दीदी के बिना उनका काम नहीं चलता था, उन्होंने उन्होंने दीदी को घर से निकाल दिया और उन से तलाक ले लिया इस दौरान उन्होंने इतना इतना कुछ सहा कि वह इतनी रूखी हो गई है और किसी से बात नहीं करती हमारी इतनी अच्छी राधिका मिलनसार राधिका की जगह इस रूखी राधिका की ने ले ली ।सभी लोग इसीलिए राधिका की बात मान लेते हैं क्योंकि वह अंदर से बहुत टूटी हुई है और आकाश भी उसको बहुत मानता है उसने इसीलिए तुम्हें नहीं बताया कि तुम उसे बेचारी न समझो , नौकरी भी राधिका इसीलिए करती है कि कोई उसको बेचारी कहकर नहीं पुकारे , मगर उसके व्यवहार के लिए क्या करें यह किसी को समझ में नहीं आता हम सब जानते हैं कि अंदर से वो बहुत ही मासूम है। मगर यह नही पता कि हमारी पहले वाली राधिका कैसे लाए ।

मैंने जब यह बातें सुनी तुम हो मेरे मन में दीदी के लिए बहुत ही सम्मान पैदा हो गया , कि यह सब दीदी अपने स्वाभिमान के लिये करती है ताकि कोई भी उन्हें बेचारी ना कहें । और वह सर उठा कर रहे ।

उसके बाद जब आकाश आये तो मैंने उनसे यह बात बताई कि, मुझे मौसी से सब बात पता चल गई है.......... उस समय बात करते-करते आकाश की आंखों से भी आंसू आ गए मैं समझ गई थी वह अपनी बहन से बहुत प्यार करते हैं । मगर मुझे समझ में नहीं आ रहा था हम क्या करें जिससे दीदी के व्यवहार में थोड़ी नरमी आए ।

अब मैं उनसे ज्यादा से ज्यादा बात करने लगी । पहले तो मैं खुद ही उन्हें पसंद नहीं करती थी इसलिए मैं ज्यादा बात नहीं करती थी मगर अब मैं खुद ही उनसे बात करने लगी हर काम के बारे में उनसे पूछने लगी , मगर उनका व्यवहार वैसा ही था वह हाँ ना के अलावा कोई जवाब नहीं देती थी वह ज्याद सजती संवरती भी नहीं थी। बिल्कुल सादी रहती थी मैं उन्हें कितनी बार बाजार जाने का भी कहती , घूमने का कहती मगर वह मेरे साथ कभी नहीं जाती मुझे समझ में नहीं आ रहा था किस तरह में उनका व्यवहार चेंज करु ।

इसी बीच पता चला कि मैं गर्भवती हूं सभी लोग मेरा बहुत ख्याल रखने लगे मगर राधिका दीदी मुझसे दूर ही दूर रहती थी । एक दिन हम सब बैठे ऐसे ही बातें कर रहे थे आकाश कह रहे थे उन्हें बेटा चाहिए मम्मी जी पापा जी बातें कर रहे थे और इसी बीच मैंने कहा कि मुझे बेटी चाहिए बिल्कुल राधिका दीदी जैसी , इसके साथ ही मैंने राधिका दीदी की तरफ देखा , तो मैंने देखा कि उनके चेहरे पर भाव आ रहे हैं तुरंत उठ कर चली गई । सब ने समझा उसकी आदत है । पर मुझे रास्ता मिल गया कि मुझे क्या करना है।

जब नौ महीने बाद मुझे प्यारी सी बिटिया हुई सब लोग बहुत खुश हो गए । राधिका दीदी भी मुझे हॉस्पिटल में देखने आयी उन्होंने कहा कुछ नहीं और बिटिया को देख कर जाने लगी मैंने उनका हाथ पकड़ लिया, और कहाँ की

"दीदी यह नहीं चलेगा यह आपकी बिटिया है मैं आपको देती हूं "

इतना कहकर मैंने दीदी के हाथ में मेरी गुड़िया देदी, दीदी की आंखों से आंसुओं की धारा की गिरने लगी , ऐसा लगा उनका इतने दिनों का जो अवसाद था वो सब बह गया । और उसी के साथ उनका रूखापन भी चला गया जब सब आये तो वह दीदी का बदला रूप देखकर बहुत खुश ही गये। उन्हें अपनी पुरानी राधिका मिल गयी थी । और आकाश गर्व भरी नजरो से मेरी तरफ देख रहे थे।🙏🌹

...जय श्री कृष्ण......
🌹🙏🌲🌹🙏🌲🌹🙏🌲

लस्सी

बनारस में एक चर्चित दूकान पर लस्सी का ऑर्डर देकर हम सब दोस्त-यार आराम से बैठकर एक दूसरे की खिंचाई और हंसी-मजाक में लगे ही थे कि एक लगभग 70-75 साल की बुजुर्ग स्त्री पैसे मांगते हुए मेरे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गई।

उनकी कमर झुकी हुई थी, चेहरे की झुर्रियों में भूख तैर रही थी। नेत्र भीतर को धंसे हुए किन्तु सजल थे। उनको देखकर मन मे न जाने क्या आया कि मैने जेब मे सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया,

"दादी लस्सी पियोगी ?"

मेरी इस बात पर दादी कम अचंभित हुईं और मेरे मित्र अधिक। क्योंकि अगर मैं उनको पैसे देता तो बस 5 या 10 रुपए ही देता लेकिन लस्सी तो 25 रुपए की एक है। इसलिए लस्सी पिलाने से मेरे गरीब हो जाने की और उस बूढ़ी दादी के द्वारा मुझे ठग कर अमीर हो जाने की संभावना बहुत अधिक बढ़ गई थी।

दादी ने सकुचाते हुए हामी भरी और अपने पास जो मांग कर जमा किए हुए 6-7 रुपए थे वो अपने कांपते हाथों से मेरी ओर बढ़ाए। मुझे कुछ समझ नही आया तो मैने उनसे पूछा,

"ये किस लिए?"

"इनको मिलाकर मेरी लस्सी के पैसे चुका देना बाबूजी !"

भावुक तो मैं उनको देखकर ही हो गया था... रही बची कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी।

एकाएक मेरी आंखें छलछला आईं और भरभराए हुए गले से मैने दुकान वाले से एक लस्सी बढ़ाने को कहा... उन्होने अपने पैसे वापस मुट्ठी मे बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गई।

अब मुझे अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि मैं वहां पर मौजूद दुकानदार, अपने दोस्तों और कई अन्य ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए नहीं कह सका।

डर था कि कहीं कोई टोक ना दे.....कहीं किसी को एक भीख मांगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर में बिठाए जाने पर आपत्ति न हो जाये... लेकिन वो कुर्सी जिसपर मैं बैठा था मुझे काट रही थी.....

लस्सी कुल्लड़ों मे भरकर हम सब मित्रों और बूढ़ी दादी के हाथों मे आते ही मैं अपना कुल्लड़ पकड़कर दादी के पास ही जमीन पर बैठ गया क्योंकि ऐसा करने के लिए तो मैं स्वतंत्र था...इससे किसी को आपत्ति नही हो सकती थी... हां! मेरे दोस्तों ने मुझे एक पल को घूरा... लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के मालिक ने आगे बढ़कर दादी को उठाकर कुर्सी पर बैठा दिया और मेरी ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा,

"ऊपर बैठ जाइए साहब! मेरे यहां ग्राहक तो बहुत आते हैं किन्तु इंसान कभी-कभार ही आता है।"

अब सबके हाथों मे लस्सी के कुल्लड़ और होठों पर सहज मुस्कुराहट थी, बस एक वो दादी ही थीं जिनकी आंखों मे तृप्ति के आंसू, होंठों पर मलाई के कुछ अंश और दिल में सैकड़ों दुआएं थीं।

न जानें क्यों जब कभी हमें 10-20 रुपए किसी भूखे गरीब को देने या उसपर खर्च करने होते हैं तो वो हमें बहुत ज्यादा लगते हैं लेकिन सोचिए कि क्या वो चंद रुपए किसी के मन को तृप्त करने से अधिक कीमती हैं?

क्या कभी भी उन रुपयों को बीयर , सिगरेट ,पर खर्च कर ऐसी दुआएं खरीदी जा सकती हैं?

जब कभी अवसर मिले ऐसे दयापूर्ण और करुणामय काम करते रहें भले ही कोई अभी आपका साथ दे या ना दे, समर्थन करे ना करें। सच मानिए इससे आपको जो आत्मिक सुख मिलेगा वह अमूल्य है!!

*☝एक बार इस कविता को*
*💘दिल से पढ़िये*
*😋शब्द शब्द में गहराई है...*

*⛺जब आंख खुली तो अम्‍मा की*
*⛺गोदी का एक सहारा था*
*⛺उसका नन्‍हा सा आंचल मुझको*
*⛺भूमण्‍डल से प्‍यारा था*

*🌹उसके चेहरे की झलक देख*
*🌹चेहरा फूलों सा खिलता था*
*🌹उसके स्‍तन की एक बूंद से*
*🌹मुझको जीवन मिलता था*

*👄हाथों से बालों को नोंचा*
*👄पैरों से खूब प्रहार किया*
*👄फिर भी उस मां ने पुचकारा*
*👄हमको जी भर के प्‍यार किया*

*🌹मैं उसका राजा बेटा था*
*🌹वो आंख का तारा कहती थी*
*🌹मैं बनूं बुढापे में उसका*
*🌹बस एक सहारा कहती थी*

*🌂उंगली को पकड. चलाया था*
*🌂पढने विद्यालय भेजा था*
*🌂मेरी नादानी को भी निज*
*🌂अन्‍तर में सदा सहेजा था*

*🌹मेरे सारे प्रश्‍नों का वो*
*🌹फौरन जवाब बन जाती थी*
*🌹मेरी राहों के कांटे चुन*
*🌹वो खुद गुलाब बन जाती थी*

*👓मैं बडा हुआ तो कॉलेज से*
*👓इक रोग प्‍यार का ले आया*
*👓जिस दिल में मां की मूरत थी*
*👓वो रामकली को दे आया*

*🌹शादी की पति से बाप बना*
*🌹अपने रिश्‍तों में झूल गया*
*🌹अब करवाचौथ मनाता हूं*
*🌹मां की ममता को भूल गया*

*☝हम भूल गये उसकी ममता*
*☝मेरे जीवन की थाती थी*
*☝हम भूल गये अपना जीवन*
*☝वो अमृत वाली छाती थी*

*🌹हम भूल गये वो खुद भूखी*
*🌹रह करके हमें खिलाती थी*
*🌹हमको सूखा बिस्‍तर देकर*
*🌹खुद गीले में सो जाती थी*

*💻हम भूल गये उसने ही*
*💻होठों को भाषा सिखलायी थी*
*💻मेरी नीदों के लिए रात भर*
*💻उसने लोरी गायी थी*

*🌹हम भूल गये हर गलती पर*
*🌹उसने डांटा समझाया था*
*🌹बच जाउं बुरी नजर से*
*🌹काला टीका सदा लगाया था*

*🏯हम बडे हुए तो ममता वाले*
*🏯सारे बन्‍धन तोड. आए*
*🏯बंगले में कुत्‍ते पाल लिए*
*🏯मां को वृद्धाश्रम छोड आए*

*🌹उसके सपनों का महल गिरा कर*
*🌹कंकर-कंकर बीन लिए*
*🌹खुदग़र्जी में उसके सुहाग के*
*🌹आभूषण तक छीन लिए*

*👑हम मां को घर के बंटवारे की*
*👑अभिलाषा तक ले आए*
*👑उसको पावन मंदिर से*
*👑गाली की भाषा तक ले आए*

*🌹मां की ममता को देख मौत भी*
*🌹आगे से हट जाती है*
*🌹गर मां अपमानित होती*
*🌹धरती की छाती फट जाती है*

*💧घर को पूरा जीवन देकर*
*💧बेचारी मां क्‍या पाती है*
*💧रूखा सूखा खा लेती है*
*💧पानी पीकर सो जाती है*

*🌹जो मां जैसी देवी घर के*
*🌹मंदिर में नहीं रख सकते हैं*
*🌹वो लाखों पुण्‍य भले कर लें*
*🌹इंसान नहीं बन सकते हैं*

*✋मां जिसको भी जल दे दे*
*✋वो पौधा संदल बन जाता है*
*✋मां के चरणों को छूकर पानी*
*✋गंगाजल बन जाता है*

*🌹मां के आंचल ने युगों-युगों से*
*🌹भगवानों को पाला है*
*🌹मां के चरणों में जन्‍नत है*
*🌹गिरिजाघर और शिवाला है*

*🌹हर घर में मां की पूजा हो*
*🌹ऐसा संकल्‍प उठाता हूं*
*🌹मैं दुनियां की हर मां के*
*🌹चरणों में ये शीश झुकाता हूं..*


​एक किसान की मन की बात​:- 😞😞😞😞😞😞😞😞😞
कहते हैं..

इन्सान सपना देखता है
तो वो ज़रूर पूरा होता है.
मगर
किसान के सपने
कभी पूरे नहीं होते।

बड़े अरमान और कड़ी मेहनत से फसल तैयार करता है, और जब तैयार हुई फसल को बेचने मंडी जाता है।
बड़ा खुश होते हुए जाता है...
बच्चों से कहता है...
आज तुम्हारे लिये नये कपड़े लाऊंगा फल और मिठाई भी लाऊंगा।।

पत्नी से कहता है..
तुम्हारी साड़ी भी कितनी पुरानी हो गई है फटने भी लगी है आज एक साड़ी नई लेता आऊंगा।।
😞😞😞😞😞
पत्नी:–”अरे नही जी..!”
“ये तो अभी ठीक है..!”
“आप तो अपने लिये
जूते ही लेते आना कितने पुराने हो गये हैं और फट भी तो गये हैं..!”

जब
किसान मंडी पहुँचता है।

ये उसकी मजबूरी है..
वो अपने माल की कीमत खुद नहीं लगा पाता।

व्यापारी
उसके माल की कीमत
अपने हिसाब से तय करते हैं...

एक
साबुन की टिकिया पर भी उसकी कीमत लिखी होती है.।

एक
माचिस की डिब्बी पर भी उसकी कीमत लिखी होती है.।

लेकिन किसान
अपने माल की कीमत खु़द नहीं कर पाता .।

खैर..
माल बिक जाता है,
लेकिन कीमत
उसकी सोच अनुरूप नहीं मिल पाती.।

माल तौलाई के बाद
जब पेमेन्ट मिलता है..

वो सोचता है..
इसमें से दवाई वाले को देना है, खाद वाले को देना है, मज़दूर को देना है ,

अरे हाँ,
बिजली का बिल
भी तो जमा करना है.

सारा हिसाब
लगाने के बाद कुछ बचता ही नहीं.।।

वो मायूस हो
घर लौट आता है।।

बच्चे उसे बाहर ही इन्तज़ार करते हुए मिल जाते हैं...
“पिताजी..! पिताजी..!” कहते हुये उससे लिपट जाते हैं और पूछते हैं:-
“हमारे नये कपडे़ नहीं ला़ये..?”

पिता:–”वो क्या है बेटा..,
कि बाजार में अच्छे कपडे़ मिले ही नहीं,
दुकानदार कह रहा था,
इस बार दिवाली पर अच्छे कपडे़ आयेंगे तब ले लेंगे..!”

पत्नी समझ जाती है, फसल
कम भाव में बिकी है,
वो बच्चों को समझा कर बाहर भेज देती है.।

पति:–”अरे हाँ..!”
“तुम्हारी साड़ी भी नहीं ला पाया..!”

पत्नी:–”कोई बात नहीं जी, हम बाद में ले लेंगे लेकिन आप अपने जूते तो ले आते..!”
पति:– “अरे वो तो मैं भूल ही गया..!”
पत्नी भी पति के साथ सालों से है पति का मायूस चेहरा और बात करने के तरीके से ही उसकी परेशानी समझ जाती है
लेकिन फिर भी पति को दिलासा देती है .।

और अपनी नम आँखों को साड़ी के पल्लू से छिपाती रसोई की ओर चली जाती है.।
फिर अगले दिन..
सुबह पूरा परिवार एक नयी उम्मीद ,
एक नई आशा एक नये सपने के साथ नई फसल की तैयारी के लिये जुट जाता है.।
….

ये कहानी...
हर छोटे और मध्यम किसान की ज़िन्दगी में हर साल दोहराई जाती है।।
…..

हम ये नहीं कहते
कि हर बार फसल के
सही दाम नहीं मिलते,

लेकिन...
जब भी कभी दाम बढ़ें, मीडिया वाले कैमरा ले के मंडी पहुच जाते हैं और खबर को दिन में दस दस बार दिखाते हैं.।।

कैमरे के सामने शहरी महिलायें हाथ में बास्केट ले कर अपना मेकअप ठीक करती मुस्कराती हुई कहती हैं...
सब्जी के दाम बहुत बढ़ गये हैं हमारी रसोई का बजट ही बिगड़ गया.।।
………

कभी अपने बास्केट को कोने में रख कर किसी खेत में जा कर किसान की हालत तो देखिये.।
वो किस तरह
फसल को पानी देता है.।।

25 लीटर दवाई से भरी हुई टंकी पीठ पर लाद कर छिङ़काव करता है||
20 किलो खाद की
तगाड़ी उठा कर खेतों में घूम-घूम कर फसल को खाद देता है.||

अघोषित बिजली कटौती के चलते रात-रात भर बिजली चालू होने के इन्तज़ार में जागता है.||
चिलचिलाती धूप में
सिर का पसीना पैर तक बहाता है.|

ज़हरीले जन्तुओं
का डर होते भी
खेतों में नंगे पैर घूमता है.||
……

जिस दिन
ये वास्तविकता
आप अपनी आँखों से
देख लेंगे, उस दिन आपके
किचन में रखी हुई सब्ज़ी, प्याज़, गेहूँ, चावल, दाल, फल, मसाले, दूध
सब सस्ते लगने लगेंगे.||

तभी तो आप भी एक मज़दूर और किसान का दर्द समझ सकेंगे।।
अगर आगे नहीं भेज सकते तो वापस मुझे भेज देना।
​मैं भी किसान का बेटा हुँ​😌😌😌😌😌😌

"*जय जवान जय किसान*"