जैसे ही ट्रेन रवाना होने को हुई, एक औरत और उसका पति एक ट्रंक लिए डिब्बे में घुस पडे़।दरवाजे के पास ही औरत तो बैठ गई पर आदमी चिंतातुर खड़ा था।जानता था कि उसके पास जनरल टिकट है और ये रिज़र्वेशन डिब्बा है।टीसी को टिकट दिखाते उसने हाथ जोड़ दिए।
" ये जनरल टिकट है।अगले स्टेशन पर जनरल डिब्बे में चले जाना।वरना आठ सौ की रसीद बनेगी।" कह टीसी आगे चला गया।
पति-पत्नी दोनों बेटी को पहला बेटा होने पर उसे देखने जा रहे थे।सेठ ने बड़ी मुश्किल से दो दिन की छुट्टी और सात सौ रुपये एडवांस दिए थे। बीबी व लोहे की पेटी के साथ जनरल बोगी में बहुत कोशिश की पर घुस नहीं पाए थे। लाचार हो स्लिपर क्लास में आ गए थे। " साब, बीबी और सामान के साथ जनरल डिब्बे में चढ़ नहीं सकते।हम यहीं कोने में खड़े रहेंगे।बड़ी मेहरबानी होगी।" टीसी की ओर सौ का नोट बढ़ाते हुए कहा।
" सौ में कुछ नहीं होता।आठ सौ निकालो वरना उतर जाओ।"
" आठ सौ तो गुड्डो की डिलिवरी में भी नहीं लगे साब।नाती को देखने जा रहे हैं।गरीब लोग हैं, जाने दो न साब।" अबकि बार पत्नी ने कहा।
" तो फिर ऐसा करो, चार सौ निकालो।एक की रसीद बना देता हूँ, दोनों बैठे रहो।"
" ये लो साब, रसीद रहने दो।दो सौ रुपये बढ़ाते हुए आदमी बोला।
" नहीं-नहीं रसीद दो बनानी ही पड़ेगी।देश में बुलेट ट्रेन जो आ रही है।एक लाख करोड़ का खर्च है।कहाँ से आयेगा इतना पैसा ? रसीद बना-बनाकर ही तो जमा करना है।ऊपर से आर्डर है।रसीद तो बनेगी ही।
चलो, जल्दी चार सौ निकालो।वरना स्टेशन आ रहा है, उतरकर जनरल बोगी में चले जाओ।" इस बार कुछ डांटते हुए टीसी बोला।
आदमी ने चार सौ रुपए ऐसे दिए मानो अपना कलेजा निकालकर दे रहा हो। पास ही खड़े दो यात्री बतिया रहे थे।" ये बुलेट ट्रेन क्या बला है ? "
" बला नहीं जादू है जादू।बिना पासपोर्ट के जापान की सैर। जमीन पर चलने वाला हवाई जहाज है, और इसका किराया भी हबाई सफ़र के बराबर होगा, बिना रिजर्वेशन उसे देख भी लो तो चालान हो जाएगा। एक लाख करोड़ का प्रोजेक्ट है। राजा हरिश्चंद्र को भी ठेका मिले तो बिना एक पैसा खाये खाते में करोड़ों जमा हो जाए।
सुना है, "अच्छे दिन " इसी ट्रेन में बैठकर आनेवाले हैं। "
उनकी इन बातों पर आसपास के लोग मजा ले रहे थे। मगर वे दोनों पति-पत्नी उदास रुआंसे
ऐसे बैठे थे मानो नाती के पैदा होने पर नहीं उसके सोग में जा रहे हो। कैसे एडजस्ट करेंगे ये चार सौ रुपए? क्या वापसी की टिकट के लिए समधी से पैसे मांगना होगा? नहीं-नहीं। आखिर में पति बोला- " सौ- डेढ़ सौ तो मैं ज्यादा लाया ही था। गुड्डो के घर पैदल ही चलेंगे। शाम को खाना नहीं खायेंगे। दो सौ तो एडजस्ट हो गए। और हाँ, आते वक्त पैसिंजर से आयेंगे। सौ रूपए बचेंगे। एक दिन जरूर ज्यादा लगेगा। सेठ भी चिल्लायेगा। मगर मुन्ने के लिए सब सह लूंगा।मगर फिर भी ये तो तीन सौ ही हुए।"
" ऐसा करते हैं, नाना-नानी की तरफ से जो हम सौ-सौ देनेवाले थे न, अब दोनों मिलकर सौ देंगे। हम अलग थोड़े ही हैं। हो गए न चार सौ एडजस्ट।" पत्नी के कहा। " मगर मुन्ने के कम करना....""
और पति की आँख छलक पड़ी।
" मन क्यूँ भारी करते हो जी। गुड्डो जब मुन्ना को लेकर घर आयेंगी; तब दो सौ ज्यादा दे देंगे। "कहते हुए उसकी आँख भी छलक उठी।
फिर आँख पोंछते हुए बोली-" अगर मुझे कहीं मोदीजी मिले तो कहूंगी-" इतने पैसों की बुलेट ट्रेन चलाने के बजाय, इतने पैसों से हर ट्रेन में चार-चार जनरल बोगी लगा दो, जिससे न तो हम जैसों को टिकट होते हुए भी जलील होना पड़े और ना ही हमारे मुन्ने के सौ रुपये कम हो।" उसकी आँख फिर छलके पड़ी।
" अरी पगली, हम गरीब आदमी हैं, हमें
मोदीजी को वोट देने का तो अधिकार है, पर सलाह देने का नहीं। रो मत
विनम्र प्राथना है जो भी इस कहानी को पढ चूका है उसने इस घटना से शायद ही इत्तिफ़ाक़ हो पर अगर ये कहानी शेयर करे कॉपी पेस्ट करे पर रुकने न दे शायद रेल मंत्रालय जनरल बोगी की भी परिस्थितियों को समझ सके। उसमे सफर करने वाला एक गरीब तबका है जिसका शोषण चिर कालीन से होता आया है।

🌹🙏परिवर्तन 🙏🌹

मैं जब शादी होकर ससुराल आई , तो मैंने देखा वहां पर मेरी बड़ी ननद का राज चलता है । और हर कोई उन्हीं की बात मानता था , कोई उनके सामने किसी बात पर बहस नहीं करता था । मैंने अपने पति से बात करने की कोशिश की थी , उन्होंने यही कहा कि "वह जो बोले वह काम कर दो बाकी तुम्हें कुछ बोलने की जरूरत नहीं है अगर वह गलत भी बोलेगी तो हां कह देना" मुझे यह समझ में नहीं आता कि ऐसा क्या है कि हर कोई उनसे डरता है कोई भी उनको कोई बोल नही सकता वह रूठ जाती थी, यहां तक की मेरे सास ससुर भी उनकी बातें मानते थे । वह जॉब करती थी। मुझे वह पत्थर दिल लगती थी । वे मुुुझसे ज्यादा बात भी नहीं करती थी । उनका एक रूटिन बना था उसमें कोई भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता था वह 6:00 बजे उठ कर घूमने जााती थी 8:00 बजे उन्हें नाश्ता चाहिए था पेपर के साथ चाय नाश्ता करनेे के बाद 10:00 बजे ऑफिस जाती थी ।ऑफिस से 4:00 बजे वापस आती थी । और आकर आराम कुर्सी पर आराम करती थी शाम को टहलने निकलती थी उसके बाद 9:00 बजे सो जाती थी उनका पूरा रूटीन था और सब काम टाइम टेेेेबल से ही करती थी ।मगर वह वह घर का कोई काम नही करती थी । वह मिजाज बड़ी सख्त थी मैंने बहुत कोशिश करी ऐसा क्या कारण है दीदी का ऐसा रूखा व्यवहार है और सभी लोग उनकी बात मानते हैं , मगर मुझेे समझ में नही आता था ।

मुझे उनसे नफरत होने लगी थी ।

एक दिन घर पर कोई नहीं था और मेरी मौसी सास आई । जब मैंने उनसे इस बारे में पूछा उन्होंने बताया राधिका (यह हमारी दीदी का नाम था) पहले ऐसी नहीं थी वह बहुत ही मिलनसार लड़की थी और सब से मिलजुल कर रहती थी सबका काम करती थी । फिर उसकी शादी की उम्र हुई तो अच्छा लड़का और परिवार देखकर उसकी शादी भी कर दी। दीदी का परिवार बहुत अच्छा था। वो लोग दीदी को भी बहुत मानते थे । मगर 2 साल तक होने बच्चे नहीं हुए दोनों ने डॉक्टर से जांच करवाई तब पता चला कि दीदी के गर्भाशय में बीमारी है जिस वजह से उन्हें बच्चे नहीं हो सकते । यह बात जाानकर उनके पति और ससुराल वालों ने,.... जो वह ससुराल वाले जो दीदी को बहुत प्यार करते थे दीदी के बिना उनका काम नहीं चलता था, उन्होंने उन्होंने दीदी को घर से निकाल दिया और उन से तलाक ले लिया इस दौरान उन्होंने इतना इतना कुछ सहा कि वह इतनी रूखी हो गई है और किसी से बात नहीं करती हमारी इतनी अच्छी राधिका मिलनसार राधिका की जगह इस रूखी राधिका की ने ले ली ।सभी लोग इसीलिए राधिका की बात मान लेते हैं क्योंकि वह अंदर से बहुत टूटी हुई है और आकाश भी उसको बहुत मानता है उसने इसीलिए तुम्हें नहीं बताया कि तुम उसे बेचारी न समझो , नौकरी भी राधिका इसीलिए करती है कि कोई उसको बेचारी कहकर नहीं पुकारे , मगर उसके व्यवहार के लिए क्या करें यह किसी को समझ में नहीं आता हम सब जानते हैं कि अंदर से वो बहुत ही मासूम है। मगर यह नही पता कि हमारी पहले वाली राधिका कैसे लाए ।

मैंने जब यह बातें सुनी तुम हो मेरे मन में दीदी के लिए बहुत ही सम्मान पैदा हो गया , कि यह सब दीदी अपने स्वाभिमान के लिये करती है ताकि कोई भी उन्हें बेचारी ना कहें । और वह सर उठा कर रहे ।

उसके बाद जब आकाश आये तो मैंने उनसे यह बात बताई कि, मुझे मौसी से सब बात पता चल गई है.......... उस समय बात करते-करते आकाश की आंखों से भी आंसू आ गए मैं समझ गई थी वह अपनी बहन से बहुत प्यार करते हैं । मगर मुझे समझ में नहीं आ रहा था हम क्या करें जिससे दीदी के व्यवहार में थोड़ी नरमी आए ।

अब मैं उनसे ज्यादा से ज्यादा बात करने लगी । पहले तो मैं खुद ही उन्हें पसंद नहीं करती थी इसलिए मैं ज्यादा बात नहीं करती थी मगर अब मैं खुद ही उनसे बात करने लगी हर काम के बारे में उनसे पूछने लगी , मगर उनका व्यवहार वैसा ही था वह हाँ ना के अलावा कोई जवाब नहीं देती थी वह ज्याद सजती संवरती भी नहीं थी। बिल्कुल सादी रहती थी मैं उन्हें कितनी बार बाजार जाने का भी कहती , घूमने का कहती मगर वह मेरे साथ कभी नहीं जाती मुझे समझ में नहीं आ रहा था किस तरह में उनका व्यवहार चेंज करु ।

इसी बीच पता चला कि मैं गर्भवती हूं सभी लोग मेरा बहुत ख्याल रखने लगे मगर राधिका दीदी मुझसे दूर ही दूर रहती थी । एक दिन हम सब बैठे ऐसे ही बातें कर रहे थे आकाश कह रहे थे उन्हें बेटा चाहिए मम्मी जी पापा जी बातें कर रहे थे और इसी बीच मैंने कहा कि मुझे बेटी चाहिए बिल्कुल राधिका दीदी जैसी , इसके साथ ही मैंने राधिका दीदी की तरफ देखा , तो मैंने देखा कि उनके चेहरे पर भाव आ रहे हैं तुरंत उठ कर चली गई । सब ने समझा उसकी आदत है । पर मुझे रास्ता मिल गया कि मुझे क्या करना है।

जब नौ महीने बाद मुझे प्यारी सी बिटिया हुई सब लोग बहुत खुश हो गए । राधिका दीदी भी मुझे हॉस्पिटल में देखने आयी उन्होंने कहा कुछ नहीं और बिटिया को देख कर जाने लगी मैंने उनका हाथ पकड़ लिया, और कहाँ की

"दीदी यह नहीं चलेगा यह आपकी बिटिया है मैं आपको देती हूं "

इतना कहकर मैंने दीदी के हाथ में मेरी गुड़िया देदी, दीदी की आंखों से आंसुओं की धारा की गिरने लगी , ऐसा लगा उनका इतने दिनों का जो अवसाद था वो सब बह गया । और उसी के साथ उनका रूखापन भी चला गया जब सब आये तो वह दीदी का बदला रूप देखकर बहुत खुश ही गये। उन्हें अपनी पुरानी राधिका मिल गयी थी । और आकाश गर्व भरी नजरो से मेरी तरफ देख रहे थे।🙏🌹

...जय श्री कृष्ण......
🌹🙏🌲🌹🙏🌲🌹🙏🌲

लस्सी

बनारस में एक चर्चित दूकान पर लस्सी का ऑर्डर देकर हम सब दोस्त-यार आराम से बैठकर एक दूसरे की खिंचाई और हंसी-मजाक में लगे ही थे कि एक लगभग 70-75 साल की बुजुर्ग स्त्री पैसे मांगते हुए मेरे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गई।

उनकी कमर झुकी हुई थी, चेहरे की झुर्रियों में भूख तैर रही थी। नेत्र भीतर को धंसे हुए किन्तु सजल थे। उनको देखकर मन मे न जाने क्या आया कि मैने जेब मे सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया,

"दादी लस्सी पियोगी ?"

मेरी इस बात पर दादी कम अचंभित हुईं और मेरे मित्र अधिक। क्योंकि अगर मैं उनको पैसे देता तो बस 5 या 10 रुपए ही देता लेकिन लस्सी तो 25 रुपए की एक है। इसलिए लस्सी पिलाने से मेरे गरीब हो जाने की और उस बूढ़ी दादी के द्वारा मुझे ठग कर अमीर हो जाने की संभावना बहुत अधिक बढ़ गई थी।

दादी ने सकुचाते हुए हामी भरी और अपने पास जो मांग कर जमा किए हुए 6-7 रुपए थे वो अपने कांपते हाथों से मेरी ओर बढ़ाए। मुझे कुछ समझ नही आया तो मैने उनसे पूछा,

"ये किस लिए?"

"इनको मिलाकर मेरी लस्सी के पैसे चुका देना बाबूजी !"

भावुक तो मैं उनको देखकर ही हो गया था... रही बची कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी।

एकाएक मेरी आंखें छलछला आईं और भरभराए हुए गले से मैने दुकान वाले से एक लस्सी बढ़ाने को कहा... उन्होने अपने पैसे वापस मुट्ठी मे बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गई।

अब मुझे अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि मैं वहां पर मौजूद दुकानदार, अपने दोस्तों और कई अन्य ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए नहीं कह सका।

डर था कि कहीं कोई टोक ना दे.....कहीं किसी को एक भीख मांगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर में बिठाए जाने पर आपत्ति न हो जाये... लेकिन वो कुर्सी जिसपर मैं बैठा था मुझे काट रही थी.....

लस्सी कुल्लड़ों मे भरकर हम सब मित्रों और बूढ़ी दादी के हाथों मे आते ही मैं अपना कुल्लड़ पकड़कर दादी के पास ही जमीन पर बैठ गया क्योंकि ऐसा करने के लिए तो मैं स्वतंत्र था...इससे किसी को आपत्ति नही हो सकती थी... हां! मेरे दोस्तों ने मुझे एक पल को घूरा... लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के मालिक ने आगे बढ़कर दादी को उठाकर कुर्सी पर बैठा दिया और मेरी ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा,

"ऊपर बैठ जाइए साहब! मेरे यहां ग्राहक तो बहुत आते हैं किन्तु इंसान कभी-कभार ही आता है।"

अब सबके हाथों मे लस्सी के कुल्लड़ और होठों पर सहज मुस्कुराहट थी, बस एक वो दादी ही थीं जिनकी आंखों मे तृप्ति के आंसू, होंठों पर मलाई के कुछ अंश और दिल में सैकड़ों दुआएं थीं।

न जानें क्यों जब कभी हमें 10-20 रुपए किसी भूखे गरीब को देने या उसपर खर्च करने होते हैं तो वो हमें बहुत ज्यादा लगते हैं लेकिन सोचिए कि क्या वो चंद रुपए किसी के मन को तृप्त करने से अधिक कीमती हैं?

क्या कभी भी उन रुपयों को बीयर , सिगरेट ,पर खर्च कर ऐसी दुआएं खरीदी जा सकती हैं?

जब कभी अवसर मिले ऐसे दयापूर्ण और करुणामय काम करते रहें भले ही कोई अभी आपका साथ दे या ना दे, समर्थन करे ना करें। सच मानिए इससे आपको जो आत्मिक सुख मिलेगा वह अमूल्य है!!

*☝एक बार इस कविता को*
*💘दिल से पढ़िये*
*😋शब्द शब्द में गहराई है...*

*⛺जब आंख खुली तो अम्‍मा की*
*⛺गोदी का एक सहारा था*
*⛺उसका नन्‍हा सा आंचल मुझको*
*⛺भूमण्‍डल से प्‍यारा था*

*🌹उसके चेहरे की झलक देख*
*🌹चेहरा फूलों सा खिलता था*
*🌹उसके स्‍तन की एक बूंद से*
*🌹मुझको जीवन मिलता था*

*👄हाथों से बालों को नोंचा*
*👄पैरों से खूब प्रहार किया*
*👄फिर भी उस मां ने पुचकारा*
*👄हमको जी भर के प्‍यार किया*

*🌹मैं उसका राजा बेटा था*
*🌹वो आंख का तारा कहती थी*
*🌹मैं बनूं बुढापे में उसका*
*🌹बस एक सहारा कहती थी*

*🌂उंगली को पकड. चलाया था*
*🌂पढने विद्यालय भेजा था*
*🌂मेरी नादानी को भी निज*
*🌂अन्‍तर में सदा सहेजा था*

*🌹मेरे सारे प्रश्‍नों का वो*
*🌹फौरन जवाब बन जाती थी*
*🌹मेरी राहों के कांटे चुन*
*🌹वो खुद गुलाब बन जाती थी*

*👓मैं बडा हुआ तो कॉलेज से*
*👓इक रोग प्‍यार का ले आया*
*👓जिस दिल में मां की मूरत थी*
*👓वो रामकली को दे आया*

*🌹शादी की पति से बाप बना*
*🌹अपने रिश्‍तों में झूल गया*
*🌹अब करवाचौथ मनाता हूं*
*🌹मां की ममता को भूल गया*

*☝हम भूल गये उसकी ममता*
*☝मेरे जीवन की थाती थी*
*☝हम भूल गये अपना जीवन*
*☝वो अमृत वाली छाती थी*

*🌹हम भूल गये वो खुद भूखी*
*🌹रह करके हमें खिलाती थी*
*🌹हमको सूखा बिस्‍तर देकर*
*🌹खुद गीले में सो जाती थी*

*💻हम भूल गये उसने ही*
*💻होठों को भाषा सिखलायी थी*
*💻मेरी नीदों के लिए रात भर*
*💻उसने लोरी गायी थी*

*🌹हम भूल गये हर गलती पर*
*🌹उसने डांटा समझाया था*
*🌹बच जाउं बुरी नजर से*
*🌹काला टीका सदा लगाया था*

*🏯हम बडे हुए तो ममता वाले*
*🏯सारे बन्‍धन तोड. आए*
*🏯बंगले में कुत्‍ते पाल लिए*
*🏯मां को वृद्धाश्रम छोड आए*

*🌹उसके सपनों का महल गिरा कर*
*🌹कंकर-कंकर बीन लिए*
*🌹खुदग़र्जी में उसके सुहाग के*
*🌹आभूषण तक छीन लिए*

*👑हम मां को घर के बंटवारे की*
*👑अभिलाषा तक ले आए*
*👑उसको पावन मंदिर से*
*👑गाली की भाषा तक ले आए*

*🌹मां की ममता को देख मौत भी*
*🌹आगे से हट जाती है*
*🌹गर मां अपमानित होती*
*🌹धरती की छाती फट जाती है*

*💧घर को पूरा जीवन देकर*
*💧बेचारी मां क्‍या पाती है*
*💧रूखा सूखा खा लेती है*
*💧पानी पीकर सो जाती है*

*🌹जो मां जैसी देवी घर के*
*🌹मंदिर में नहीं रख सकते हैं*
*🌹वो लाखों पुण्‍य भले कर लें*
*🌹इंसान नहीं बन सकते हैं*

*✋मां जिसको भी जल दे दे*
*✋वो पौधा संदल बन जाता है*
*✋मां के चरणों को छूकर पानी*
*✋गंगाजल बन जाता है*

*🌹मां के आंचल ने युगों-युगों से*
*🌹भगवानों को पाला है*
*🌹मां के चरणों में जन्‍नत है*
*🌹गिरिजाघर और शिवाला है*

*🌹हर घर में मां की पूजा हो*
*🌹ऐसा संकल्‍प उठाता हूं*
*🌹मैं दुनियां की हर मां के*
*🌹चरणों में ये शीश झुकाता हूं..*


​एक किसान की मन की बात​:- 😞😞😞😞😞😞😞😞😞
कहते हैं..

इन्सान सपना देखता है
तो वो ज़रूर पूरा होता है.
मगर
किसान के सपने
कभी पूरे नहीं होते।

बड़े अरमान और कड़ी मेहनत से फसल तैयार करता है, और जब तैयार हुई फसल को बेचने मंडी जाता है।
बड़ा खुश होते हुए जाता है...
बच्चों से कहता है...
आज तुम्हारे लिये नये कपड़े लाऊंगा फल और मिठाई भी लाऊंगा।।

पत्नी से कहता है..
तुम्हारी साड़ी भी कितनी पुरानी हो गई है फटने भी लगी है आज एक साड़ी नई लेता आऊंगा।।
😞😞😞😞😞
पत्नी:–”अरे नही जी..!”
“ये तो अभी ठीक है..!”
“आप तो अपने लिये
जूते ही लेते आना कितने पुराने हो गये हैं और फट भी तो गये हैं..!”

जब
किसान मंडी पहुँचता है।

ये उसकी मजबूरी है..
वो अपने माल की कीमत खुद नहीं लगा पाता।

व्यापारी
उसके माल की कीमत
अपने हिसाब से तय करते हैं...

एक
साबुन की टिकिया पर भी उसकी कीमत लिखी होती है.।

एक
माचिस की डिब्बी पर भी उसकी कीमत लिखी होती है.।

लेकिन किसान
अपने माल की कीमत खु़द नहीं कर पाता .।

खैर..
माल बिक जाता है,
लेकिन कीमत
उसकी सोच अनुरूप नहीं मिल पाती.।

माल तौलाई के बाद
जब पेमेन्ट मिलता है..

वो सोचता है..
इसमें से दवाई वाले को देना है, खाद वाले को देना है, मज़दूर को देना है ,

अरे हाँ,
बिजली का बिल
भी तो जमा करना है.

सारा हिसाब
लगाने के बाद कुछ बचता ही नहीं.।।

वो मायूस हो
घर लौट आता है।।

बच्चे उसे बाहर ही इन्तज़ार करते हुए मिल जाते हैं...
“पिताजी..! पिताजी..!” कहते हुये उससे लिपट जाते हैं और पूछते हैं:-
“हमारे नये कपडे़ नहीं ला़ये..?”

पिता:–”वो क्या है बेटा..,
कि बाजार में अच्छे कपडे़ मिले ही नहीं,
दुकानदार कह रहा था,
इस बार दिवाली पर अच्छे कपडे़ आयेंगे तब ले लेंगे..!”

पत्नी समझ जाती है, फसल
कम भाव में बिकी है,
वो बच्चों को समझा कर बाहर भेज देती है.।

पति:–”अरे हाँ..!”
“तुम्हारी साड़ी भी नहीं ला पाया..!”

पत्नी:–”कोई बात नहीं जी, हम बाद में ले लेंगे लेकिन आप अपने जूते तो ले आते..!”
पति:– “अरे वो तो मैं भूल ही गया..!”
पत्नी भी पति के साथ सालों से है पति का मायूस चेहरा और बात करने के तरीके से ही उसकी परेशानी समझ जाती है
लेकिन फिर भी पति को दिलासा देती है .।

और अपनी नम आँखों को साड़ी के पल्लू से छिपाती रसोई की ओर चली जाती है.।
फिर अगले दिन..
सुबह पूरा परिवार एक नयी उम्मीद ,
एक नई आशा एक नये सपने के साथ नई फसल की तैयारी के लिये जुट जाता है.।
….

ये कहानी...
हर छोटे और मध्यम किसान की ज़िन्दगी में हर साल दोहराई जाती है।।
…..

हम ये नहीं कहते
कि हर बार फसल के
सही दाम नहीं मिलते,

लेकिन...
जब भी कभी दाम बढ़ें, मीडिया वाले कैमरा ले के मंडी पहुच जाते हैं और खबर को दिन में दस दस बार दिखाते हैं.।।

कैमरे के सामने शहरी महिलायें हाथ में बास्केट ले कर अपना मेकअप ठीक करती मुस्कराती हुई कहती हैं...
सब्जी के दाम बहुत बढ़ गये हैं हमारी रसोई का बजट ही बिगड़ गया.।।
………

कभी अपने बास्केट को कोने में रख कर किसी खेत में जा कर किसान की हालत तो देखिये.।
वो किस तरह
फसल को पानी देता है.।।

25 लीटर दवाई से भरी हुई टंकी पीठ पर लाद कर छिङ़काव करता है||
20 किलो खाद की
तगाड़ी उठा कर खेतों में घूम-घूम कर फसल को खाद देता है.||

अघोषित बिजली कटौती के चलते रात-रात भर बिजली चालू होने के इन्तज़ार में जागता है.||
चिलचिलाती धूप में
सिर का पसीना पैर तक बहाता है.|

ज़हरीले जन्तुओं
का डर होते भी
खेतों में नंगे पैर घूमता है.||
……

जिस दिन
ये वास्तविकता
आप अपनी आँखों से
देख लेंगे, उस दिन आपके
किचन में रखी हुई सब्ज़ी, प्याज़, गेहूँ, चावल, दाल, फल, मसाले, दूध
सब सस्ते लगने लगेंगे.||

तभी तो आप भी एक मज़दूर और किसान का दर्द समझ सकेंगे।।
अगर आगे नहीं भेज सकते तो वापस मुझे भेज देना।
​मैं भी किसान का बेटा हुँ​😌😌😌😌😌😌

"*जय जवान जय किसान*"

*सिकंदर उस जल की तलाश में था, जिसे पीने से मानव अमर हो जाते हैं.!*

*काफी दिनों तक  दुनियाँ में भटकने के पश्चात आखिरकार उस ने वह जगह पा ही ली, जहाँ उसे अमृत की प्राप्ति हो*

👉 *उसके सामने ही अमृत जल बह रहा था, वह अंजलि में अमृत को लेकर पीने के लिए झुका ही था कि तभी एक बुढा व्यक्ती जो उस गुफा के भीतर बैठा था, जोर से बोला,  रुक जा, यह भूल मत करना...!’*

*बड़ी दुर्गति की अवस्था में था वह बुढा !*

*सिकंदर ने कहा, ‘तू रोकने वाला कौन...?’*

*बुढे ने उत्तर दिया, ..मैं अमृत की तलाश में था और यह गुफा मुझे भी मिल गई थी !, मैंने यह अमृत पी लिया !*
*अब मैं मर नहीं सकता, पर मैं अब मरना चाहता हूँ... !* *देख लो मेरी हालत...अंधा हो गया हूँ, पैर गल गए हैं,  *देखो...अब मैं चिल्ला रहा हूँ...चीख रहा हूँ...कि कोई मुझे मार डाले, लेकिन मुझे मारा भी नहीं जा सकता !*
*अब प्रार्थना कर रहा हूँ  परमात्मा से कि प्रभु मुझे मौत दे !*

सिकंदर  चुपचाप गुफा से बाहर वापस लौट आया, *बिना अमृत पिए !*

*सिकंदर समझ चुका था कि जीवन का आनन्द ✨उस समय तक ही रहता है, जब तक हम उस आनन्द को भोगने की स्थिति में होते हैं!*

*इसलिए स्वास्थ्य की रक्षा कीजिये !*
*जितना जीवन मिला है,उस जीवन का भरपूर आनन्द लीजिये !*
❣🥀 *हमेशा खुश रहिये ?*❣🥀

*दुनियां में सिकंदर कोई नहीं, वक्त ही सिकंदर है..*

🙏सहृदय नमस्कार 🙏

भोपाल। भोपाल शहर को बसाने में राजा भूपाल शाही का बड़ा योगदान है। भोपाल नाम कोई अपभ्रंश नहीं बल्कि भूपाल शाही के नाम पर ही वर्तमान नाम प्रचलित है। लेकिन इस क्षेत्र से जुड़ी आदिवासी पहचान व संस्कृति को राजनीतिक हित के लिए एक-एक करके खत्म किया जा रहा है। शहर का नाम बदलकर भोजपाल करने के खिलाफ आदिवासी गोलबंद हो रहे हैं। आदिवासी समाज के संगठनों से लेकर इतिहासकारों तक ने बिना विचार-विमर्श के नाम बदल देने के एकतरफा निर्णय का विरोध किया है।
अखिल भारतीय गोंडवाना पार्टी, बहुजन यूथ स्टूडेंट फ्रंट सहित आदिवासी समाज के नेताओं ने इस कदम के विरोध की तैयारी शुरू कर दी है। गौरतलब है,महापौर ने प्रशासन अकादमी में इंटरनेशनल कांफ्रेस एंड एक्सपो ऑन राजा भोज में बोलते हुए शहर का प्राचीन नाम भोजपाल होने व भोपाल नाम अपभ्रंश के तौर पर पड़ जाने की बात कहते हुए इसका नाम फिर से भोजपाल करने का बयान दिया था।दो-दो भोजसेतू हैं, एक सड़क भी नहीं कमलापति के नाम पर आदिवासी समाज का विरोध इस बात पर है कि बीच शहर में कमलापति का महल होने के बावजूद उनके नाम पर शहर में एक सड़क का नाम तक नहीं रखा गया। शहर में एक भोज सेतू होने के बावजूद कमलापति के महल के सामने नया पुल बनाया गया तो उसका नाम भी भोज सेतू रख दिया गया।
पहले भी हुए बदलाव... बैरागढ़ क्षेत्र पर पोर्ते समाज की पहचान थी। यहां की आदिवासी पहचान धीरे-धीरे खत्म कर दी गई। पहले बैरागढ़ फिर संत हिरदाराम नगर कर दिया। वहीं जगदीशपुरा में किले को काला गौंड ने बसाया, लेकिन बाद में उसे इस्लाम नगर कर दिया गया।
'भोपाल शहर को भूपाल शाही ने बसाया था, कमलापति महल के पास स्थित सातखंडा किला हो, या आज के इस्लाम नगर का किला, जो पहले जगदीशपुरा था, जिसे काला गौंड ने बनाया था। चारों ओर आदिवासी विरासत के सबूत बिखरे पड़े हैं, जिन्हें खत्म करने की लगातार कोशिश की जा रही है। भोपाल का नाम बदलना सारी आदिवासी विरासत को मिटाने की कोशिशों की दिशा में बड़ा कदम है, लेकिन आदिवासी पहचान को इतनी आसानी से मिटाया नहीं जा सकेगा। इसके खिलाफ हम आंदोलन करेंगे। -गुलजार सिंह मरकाम, राष्ट्रीय संयोजक, अखिल भारतीय गोंडवाना पार्टी
शहर का नाम बदलने की कोशिश आदिवासी पहचान को मिटाने की कोशिश है। सरकार यह सारे कदम इसलिए ही उठा रही है, क्योंकि इन्हें आदिवासी वोट बैंक नहीं नजर आते। हम इसी सप्ताह इस कोशिश के खिलाफ बड़ी बैठक कर रहे हैं, जिसमें आंदोलन की रणनीति बनाई जाएगी। -आईएस मौर्य बहुजन यूथ स्टूडेंट फ्रंट
यह पूरा क्षेत्र इतने विस्तृत फलक पर फैला हुआ है कि यहां हजारों साल पहले से मानव सभ्यता के निशान मिलते हैं। शहर के विकास में परमार वंश से लेकर गोंड वंश तक का अपना-अपना योगदान रहा है। अनेकता में एकता ही शहर की पहचान है, अब तक जो भी बदलाव हुए उनमें तो कुछ नहीं किया जा सकता, लेकिन अब एेसा कोई भी कदम जल्दबाजी में नहीं उठाना चाहिए। मुद्दे से जुड़े विद्वानों, जानकारों के साथ चर्चा करके निर्णय लेना चाहिए, लेकिन जिन बैठकों में एेसे निर्णय लिए जाते हैं, वहां उस विषय से जुड़े लोगों की परंपरा ही यहां नजर नहीं आती है। -नारायण व्यास, इतिहासकार
यह पूरा क्षेत्र इतने विस्तृत फलक पर फैला हुआ है कि यहां हजारों साल पहले से मानव सभ्यता के निशान मिलते हैं। शहर के विकास में परमार वंश से लेकर गोंड वंश तक का अपना-अपना योगदान रहा है। अनेकता में एकता ही शहर की पहचान है, अब तक जो भी बदलाव हुए उनमें तो कुछ नहीं किया जा सकता, लेकिन अब एेसा कोई भी कदम जल्दबाजी में नहीं उठाना चाहिए। मुद्दे से जुड़े विद्वानों, जानकारों के साथ चर्चा करके निर्णय लेना चाहिए, लेकिन जिन बैठकों में एेसे निर्णय लिए जाते हैं, वहां उस विषय से जुड़े लोगों की परंपरा ही यहां नजर नहीं आती है। -नारायण व्यास, इतिहासकार

ये सच है कि हम जैसे कर्म करते है , हमे उसका वैसा ही फल मिलता है । हमारे द्वारा किए गये कर्म ही हमारे पाप और पुण्य तय करते है ।  हम अच्छे कर्म करते है तो हमे उसके अच्छे फल मिलते है , अगर हम बुरे कर्म करते है तो हमे उसके बुरे फल ही मिलते है । हमारे जीवन में जो भी परेशानीया आती है उनका सम्बंध कही ना कही हमारे कर्मो से होता है ।
कबीर जी का दोहा भी यही याद दिलाता है कि बुरे कर्मो का फल हमेशा बुरा ही होता है !! 
               
करता था सो क्यो किया , अब करि क्यो पछताय !!
      बोय पेड बबुल का , आम कहां से खाय  !!! 

नोट - कभी - कभी हम जान बूझकर गलत काम करते है तो कभी अनजाने में गलत काम कर जाते है । जिसके कारण हमे आगे चलकर परेशानी उठानी पडती है । और जब हम पर कोई परेशानी आती है तब हम पछताते है कि काश हमने ऐसा काम ना किया होता तो शायद हम मुश्किल में ना पडते !! 

  • दोस्तो अब हमे ये देखना है कि हम अपने जीवन रुपी थैले में कौन - कौन से फल इकठ्ठे कर रहे है ? अगर हमने अच्छे फल इकठ्ठे किए मतलब कि अगर हमने अच्छे कर्म किये है तो हम खुशी से अपनी जिंदगी गुजारेंगे । लेकिन हमने अपने थैले से सडे गले फल या घास फुस इकठ्ठा किए है तो हमारी जिंदगी मे कभी खुशी नही आ सकती । हम कभी सुख से चैन से नही रह सकते । हमेशा दुखी और परेशान ही रहेंगे । इसलिए हमेशा अच्छे कर्म करे और दुसरो को भी अच्छे कर्म करने के लिए प्रेरित करे ।  

 
एक किसान एक बार एक किसान जंगल में लकड़ी बिनने गया तो उसने एक अद्भुत बात देखी। एक लोमड़ी के दो पैर नहीं थे, फिर भी वह खुशी खुशी घसीट कर चल रही थी।
यह कैसे ज़िंदा रहती है जबकि किसी शिकार को भी नहीं पकड़ सकती, किसान ने सोचा. तभी उसने देखा कि एक शेर अपने दांतो में एक शिकार दबाए उसी तरफ आ रहा है. सभी जानवर भागने लगे, वह किसान भी पेड़ पर चढ़ गया । उसने देखा कि शेर, उस लोमड़ी के पास आया, उसे खाने की जगह, प्यार से शिकार का थोड़ा हिस्सा डालकर चला गया।
दूसरे दिन भी उसने देखा कि शेर बड़े प्यार से लोमड़ी को खाना देकर चला गया. किसान ने इस अद्भुत लीला के लिए भगवान का मन में नमन किया। उसे अहसास हो गया कि भगवान जिसे पैदा करते है उसकी रोटी का भी इंतजाम कर देते हैं।
यह जानकर वह भी एक निर्जन स्थान चला गया और वहां पर चुपचाप बैठ कर भोजन का रास्ता देखता। कई दिन गुज़र गए, कोई नहीं आया। वह मरणासन्न होकर वापस लौटने लगा।
तभी उसे एक विद्वान महात्मा मिले। उन्होंने उसे भोजन पानी कराया, तो वह किसान उनके चरणों में गिरकर वह लोमड़ी की बात बताते हुए बोला, महाराज, भगवान ने उस अपंग लोमड़ी पर दया दिखाई पर मैं तो मरते मरते बचा; ऐसा क्यों हुआ कि भगवान् मुझ पर इतने निर्दयी हो गए ?
महात्मा उस किसान के सर पर हाथ फिराकर मुस्कुराकर बोले, तुम इतने नासमझ हो गए कि तुमने भगवान का इशारा भी नहीं समझा इसीलिए तुम्हें इस तरह की मुसीबत उठानी पड़ी। तुम ये क्यों नहीं समझे कि भगवान् तुम्हे उस शेर की तरह मदद करने वाला बनते देखना चाहते थे, निरीह लोमड़ी की तरह नहीं।
हमारे जीवन में भी ऐसा कई बार होता है कि हमें चीजें जिस तरह समझनी चाहिए उसके विपरीत समझ लेते हैं। ईश्वर ने हम सभी के अंदर कुछ न कुछ ऐसी शक्तियां दी हैं जो हमें महान बना सकती हैं। चुनाव हमें करना है, शेर बनना है या लोमड़ी।

 *ईश्वरकी असीम कृपा आप पर प्रवाहित हो रही है।* 
जिसको आरक्षण दिया जा रहा है वो सामान्य आदमी बन ही नहीं पा रहा है....
जैसे किसी व्यक्ति को आरक्षण दिया गया और वो किसी सरकारी नौकरी में आ गया!अब उसका वेतन ₹5500 से₹50000 तक महीना है पर जब उसकी संतान हुई तो फिर वही से शुरुआत !
फिर वही गरीब पिछड़ा और सवर्णों के अत्याचार का मारा पैदा हुआ ।
उसका पिता लाखों रूपए सालाना कमा रहा है तथा उच्च पद पर आसीन है।सारी सरकारी सुविधाए ले रहा है।
वो खुद जिले के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ रहा है और सरकार उसे पिछड़ा मान रही है।
सदियों से सवर्णों के अत्याचार का शिकार मान रही है।
आपको आरक्षण देना है बिलकुल दो पर उसे नौकरी देने के बाद सामान्य तो बना दो ।
यह आरक्षण कब तक मिलता रहेगा उसे ?? इसकी भी कोई समय सीमा तो तय कर दो कि बस जाति विशेष में पैदा हो गया तो आरक्षण का हकदार हो गया।
*दादा जी जुल्म के मारे,
बाप जुल्म का मारा तथा पोता भी जुल्म का मारा!
वाह रे मेरे देश का दुर्भाग्य!*
जिस आरक्षण से उच्च पदस्थ अधिकारी , मन्त्री , प्रोफेसर , इंजीनियर, डॉक्टर भी पिछड़े ही रह जायें, ऐसे असफल अभियान को तुरंत बंद कर देना चाहिए ।
जिस कार्य से कोई आगे न बढ़ रहा हो उसे जारी रखना मूर्खतापूर्ण कार्य है।
हम में से कोई भी आरक्षण के खिलाफ नहीं, पर आरक्षण का आधार जातिगत ना होकर आर्थिक होना चाहिए।
""ऒर तत्काल प्रभाव से प्रमोशन में आरक्षण तो बंद होना ही चाहिए।नैतिकता भी यही कहती है।""
क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी मंदिर में प्रसाद बँट रहा हो तो एक व्यक्ति को चार बार मिल जाये ,और एक व्यक्ति लाइन में रहकर अपनी बारी का इंतजार ही करता रहे।
आरक्षण देना है तो उन गरीबों ,लाचारों को चुन चुन के दो जो बेचारे दो वक्त की रोटी को मोहताज हैं...चाहे वे अनपढ़ हो । चौकीदार , सफाई कर्मचारी ,सेक्युरिटी गार्ड कैसी भी नौकरी दो....हमें कोई आपत्ति नहीं।
ऐसे लोंगो को मुख्य धारा में लाना सरकार का सामाजिक उत्तरदायित्व है।
परन्तु भरे पेट वालों को बार बार 56 व्यंजन परोसने की यह नीति बंद होनी ही चाहिए।
जिसे एक बार आरक्षण मिल गया उसकी अगली पीढ़ियों को सामान्य मानना चाहिये और आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिये।